तनहा
मैं रुसवां हूँ खुदपर,
मैं क्यूं यहाँ,
महसूस करता हूँ खुद को बंदिश में,
हैं खुदाँ कहाँ?
ये ज़िन्दगी के नगमे गातें लोग,
आसपास मेरें,
मैं मौत की गहराईयों में खोया,
हैं ज़िन्दगी क्या?
हमेशा ही खोया हूँ मैं,
खोज में, उस अनजान सवाल के जवाब की,
जो शायद खुद ही हैं आखरी सत्य जीवन का.
क्या पता मैं हूँ भी या नहीं,
ये तनहाई मुझे चीरती हैं;
और भीड़ में भी मैं खुद को,
महसूस करता हूँ तनहा.
(10—12 July 1997; Ganesh Bagler)
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