हर वक़्त ज़िन्दगीके,
दायरेपे खड़ा हूँ |
क्या पता किस कदम,
उसे लांघ जावूँ |
Ganesh Bagler(30 Nov 2010; Diary Notes)
दायरेपे खड़ा हूँ |
क्या पता किस कदम,
उसे लांघ जावूँ |
Ganesh Bagler(30 Nov 2010; Diary Notes)
तनहा
मैं रुसवां हूँ खुदपर,
मैं क्यूं यहाँ,
महसूस करता हूँ खुद को बंदिश में,
हैं खुदाँ कहाँ?
ये ज़िन्दगी के नगमे गातें लोग,
आसपास मेरें,
मैं मौत की गहराईयों में खोया,
हैं ज़िन्दगी क्या?
हमेशा ही खोया हूँ मैं,
खोज में, उस अनजान सवाल के जवाब की,
जो शायद खुद ही हैं आखरी सत्य जीवन का.
क्या पता मैं हूँ भी या नहीं,
ये तनहाई मुझे चीरती हैं;
और भीड़ में भी मैं खुद को,
महसूस करता हूँ तनहा.
बहुत सारी यादें,
दफन थीं यहाँ,
कुरेदतां हूँ बहूत, कुछ मिलता ही नहीं;
ठीक ही तो हैं,
इक अरसा गुजरा हैं.
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मालूम नहीं हमें, के हम
डरे हैं मौत से, या बेखबर है उससे
पर माहौल ही कुछ ऐसा है
के दस्तक सुनाई देती है.
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भूलें नहीं अभीतक हम उस फिजां को,
याद आती हैं.
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अलग से नशे कि ज़रुरत ही क्या हमें,~~~~~~~~~~~~~~~
हर इक ख़याल खो जाने को काफी है;
मरने की ज़रुरत ही क्या हमें,
हर लम्हा मौत, बस आना बाकी है.