बहुत सारी यादें,
दफन थीं यहाँ,
कुरेदतां हूँ बहूत, कुछ मिलता ही नहीं;
ठीक ही तो हैं,
इक अरसा गुजरा हैं.
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मालूम नहीं हमें, के हम
डरे हैं मौत से, या बेखबर है उससे
पर माहौल ही कुछ ऐसा है
के दस्तक सुनाई देती है.
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भूलें नहीं अभीतक हम उस फिजां को,
याद आती हैं.
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अलग से नशे कि ज़रुरत ही क्या हमें,~~~~~~~~~~~~~~~
हर इक ख़याल खो जाने को काफी है;
मरने की ज़रुरत ही क्या हमें,
हर लम्हा मौत, बस आना बाकी है.
(3—7 November 1997, Pune; Ganesh Bagler )
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